जख्म ए आवाम


सन्नाटों को हवाओं का लतीफा सुनाया जाए।

जो है अंधेरे मे उसे उजाले मे लाया जाए।


कहते भी तुम सुनते भी तुम क्या मांजरा है,

क्या छुपा रहे हो जरा हमे भी दिखाया जाए।


बडी धूमधाम से कहते थे आसमान छूएंगे हम,

कितना गड्डा खुदाया सबको दिखाया जाए।


अच्छे दिनों की तलाश मे दर दर भटक रहा है आम इंसान,

भूक प्यास धूप सहनेवालोंको अच्छा दिन दिखाया जाए।


तुम ही सुरज तुम ही चांद तुम ही आसमां हो,

इन आसमानों के परींदोंको जमीं पर लाया जाए।


अमन चैन सूकून और आबाद रहना चाहते हो,

तो लोगो ताज पहेना हूआ वो सर बदल दिया जाए।


कवीराज( हणमंत यादव)