मेरी स्याह रातो के शरीक
मेरे हमदम,मेरे ग़म-गुसार
मेरे दुखों के साथी,मेरे राज़दार
अगर हो मुमकिन तो उस से कहना
कि इक तुम्हारा वह चाहने वाला
सुबह तलक मुन्तज़िर है रहता
कि तुम ने इक दिन कहा था उस से
मिलेंगे हम फिर कहीं दोबारा
वह चांद ढलने से पहले पहले
तुम्हारा छोटा सा एक वादा
किसी को जीवन दिये हुए है
तुम्हारे मिलने की आस अब तक
यह दिल बेचारा लिए हुए है !!
हफ़ीज़ बिन अज़ीज़