मेरी स्याह रातों के शरीक
मेरे ग़म के हिस्सेदार
मेरे राज़दार
जो हो सके तो
उस से कहना
कि वह तुम्हारा चाहने वाला
सुबह तक इंतेज़ार करता है
कि तुम ने इक दिन कहा था उस से
मिलेंगे हम फिर कहीं दोबारा
वह चांद ढलने से पहले पहले !
(हफ़ीज़ बिन अज़ीज़)
मेरी स्याह रातों के शरीक
मेरे ग़म के हिस्सेदार
मेरे राज़दार
जो हो सके तो
उस से कहना
कि वह तुम्हारा चाहने वाला
सुबह तक इंतेज़ार करता है
कि तुम ने इक दिन कहा था उस से
मिलेंगे हम फिर कहीं दोबारा
वह चांद ढलने से पहले पहले !
(हफ़ीज़ बिन अज़ीज़)