ज़िंदगी की जद्दोजहद में हज़ार मसरूफियत में झुंझलाए आलम के बीच कोई है जो दिखता है मेरे ख़यालों से झाँकता इक मुस्कान लिए उसकी मौजूदगी के अहसास भर से बरबस मेरे चेहरे पर बिखर जाती है मुस्कुराहट और मैं फ़िर से जीने लगता हूँ अपने वजूद को और बस ऐसे ही वो रोज़ बहला के ले आता है बेशुमार उलझनों से इक पुरसुकूं मंज़र पर