कितना चलता जाऊं तुम्हारी ओर,
कि मिल जाए बस आंचल का छोर?
अभी तो है ये रात फैली हुई...
पर क्या पता कब हो जाए भोर।
@गुस्ताख़ © अर्चित
तुम्हारी तह तक आकर जो लौट जाऊं,
ऐसा नहीं कि पीछे फिर मुड़ न पाऊं।
चमकता तेरा आज रंग सुनहरा...
स्वेत परछाईं के पल किस संग बिताऊं?
@गुस्ताख़ © अर्चित
तम में जो छाया हुआ है तेरा नूर,
तारे हो कर भी हैं रिक्तता से पूर।
दिशायें भले बदल क्यों न जाएं...
अंतः है बनता आगोश का 'सूर'।
@गुस्ताख़ © अर्चित

