इज़हार से इंतजार की राह,वक्त परत कहां हो गई गुम?जज़्बात से एहसास की चाह,भूल कर गए बढ़ बेशक तुम।आरज़ू से क्यूं है गुलज़ार,नई सहर की भीनी धुन?एतराज़ नहीं कोई मल्हार,जो गुमनामी रहे बैठे सुन।
इज़हार से इंतजार की राह,वक्त परत कहां हो गई गुम?जज़्बात से एहसास की चाह,भूल कर गए बढ़ बेशक तुम।
आरज़ू से क्यूं है गुलज़ार,नई सहर की भीनी धुन?एतराज़ नहीं कोई मल्हार,जो गुमनामी रहे बैठे सुन।