सुनसान सड़कों पर भटकते हुए वो जिन्हें कभी कोई खाना नहीं देता, मांगने पर छज्जे तले छांव और गला तर करने के लिए पानी तक से दुत्कार दिया जाता है; वो लोग आज शायद थोड़ा खुश होंगे।
चुनाव की गहमागहमी में उनके लिए पूंजी पात्र तोड़े गये हैं। वादों की दिनचर्या प्रारंभ करी गई है और तो और भण्डार ग्रहों के वे ताले भी खुल गये हैं जिनपर जंग की मोटी परत घात लगाए बैठी रहती थी।
ऐसे तो रैनबसेरे नामोपरांत बारिश नहीं तो ज़्यादा से ज़्यादा हाड़ कंपा देने वाली ठंड में कभी कभार अपने किवाड़ की कुंडी सरका कर एक आध अधमरे को अपना दुगर्म ग्रह गर्भ दिखाते थे। पर इस बार क्या शरद क्या शिशिर और क्या ही ग्रीष्म का पूर्वाभास! चौखट सरीखी सरहदें ही मानों रहस्यमय ढंग से गायब हैं। हर पार्टी अपने पंचवर्षीय योजना के घोषणापत्र को ही सारे दुःखों की चाभी बता रही है।
सुगबुगाहट जोरों पर है! चुनाव आने वाले हैं, योजनाएं बनने वाली है, राशन की मात्रा बढ़ने वाली है। और जनमत?? मत प्रतिशत बेशक बढ़ने वाले हैं, अरे युवा कुछ ज़्यादा युवा हो रहा है, हर व्रद्ध अब नेता हो रहा है और बेघर; उनको तो अस्थाई मानें 'टेंपररी' रैनबसेरे मिल ही गये हैं। और क्या ही लेना!
@गुस्ताख़शब्द
©अर्चित

