हे राम!!
काश कि तुम जान पाते
अग्निपरीक्षा में नहीं जली थी
मेरी देह
जो जल गया था
वो मेरा मन था
तुम्हारी सीता का मन ।।
हे लक्ष्मण !!
काश कि तुम समझ पाते
बलिदान तो तुमने किया था
पर जो बलि की वेदी पर
खंडित हुई थी
वो थी
मेरी आत्मा
तुम्हारी उर्मिला की आत्मा ।।
हे बुद्ध !!
काश कि तुम देख पाते
उस पेड़ की पत्तियां
जिसके तले तुमने
आत्मसात किया था
समस्त ज्ञान को
वो पीली पत्तियां
तुम्हारी बांट जोहती
मेरी आंखें थी
तुम्हारी यशोधरा की आंखें ।।
हे पुरुष !!
काश कि तुम सोच पाते
तुम्हारे लिए आसान रहा होगा
राम, लक्ष्मण या बुद्ध होना
पर मेरे लिए
वेदना था
सीता, उर्मिला और यशोधरा बन पाना ।।
गुंजन


