मेरे सात गुरु


कच्ची मिट्टी को सांचे में ढाल देती है 

अँधेरे गर्भ को स्वर्ग बना देती है 

जिसे अपने होने का भी पता नहीं

उसको हाथ पैर मारना सिखा देती है : पहली गुरु माँ होती है 


जो चल न सके उसे मीलों टहला देते हैं 

जो मात्र खिलोने के टूटने से बिखर जाये उसे संभल लेते हैं 

जिसे अपने आज का भी बोध नहीं 

उसे अपना कल संवारना सिखा देते हैं : दूसरे गुरु पिता होते है 


नादानी की सराहना करती हैं 

दुनिया से लड़कर भी साथ देती हैं 

जब कोई ठिकाना न मिले तो सिरहाना देती हैं 

अनुभव की चाबी से अपरिपक्व को स्थिरता देती हैं : तीसरी गुरु दादी होती हैं 


नन्ही बिटिया जब घर से निकलती है

अध्यापक के हाथ उसे थाम लेते हैं 

विज्ञान इतिहास साहित्य का ज्ञान, और 

जीवन के पथ सींचना सिखा देते हैं : चौथे गुरु अध्यापक होते हैं 


जो हमने जिया नहीं, वो दिखता है 

दूसरों के त्रुटियों से सीख दे, हमें बचाता है 

कभी निर्मम सत्य से, कभी ठोस तथ्य से 

हमारे कल को कल से संवारता है : पांचवा गुरु इतिहास होता हैं 


खुद को हो जाए जब खुद के होने का गुरूर 

अधजल गगरी में ठहराव लाते हैं 

कौन होगा हमसे बेहतर इस जहान में 

फूहड़ अखड़पन का भ्रम निपटाते हैं : छठे गुरु प्रतिद्वंद्वी होते हैं 


कहीं धूप कहीं छाँव में साल बीतते हैं 

गलती से गिरते, सबक से संभलते हैं 

क्या करता जो जस होता - क्या न करता जो तस होता   

पंचतत्व में मिलने के बाद भी जो सिखाता है : सातवां गुरु जीवन होता है