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तज़ुर्बा -ए-जिन्दगी


तुम को पा कर खुद को पाया था ,तुम को खो कर भी खुद को पाया है .

क्या कुछ बदल गया इस दर्मियांकुर्बत से रुख़्सत होने का फासला ,

जां निसारी से बेरुखी का रंज़-ओ -ग़मतजु़र्बा -ए -ज़िन्दगी बेशुमार लाया है .

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