वोह भी क्या मंजर था , मेरी पीठ और उसका खंजर था . मेरे सदके की यह इंतेहा हुई , मुझे शिकवा फिर भी न था . उफ भी न की , जख्म कोई हलका न था , कातिल-ए अरमान अपना न सही, पर "गुमनाम" कोई गैर भी न था .