चुस्त प्रशासन ,
नम्र प्रशासन,
भव्य आयोजन,
एक दूसरे की मदद करता वो ,
आस्था का हुजूम ,
नेताओं की मार्केटिंग स्किल्स,
चारों ओर जय जयकार,
कुंभ में जो देखा , जो सुना,
यकीन नहीं होता ,
शायद हम बहुत किस्मत वाले हैं,
मानव भावनाओं ,
कुशलताओं
और संभावनाओं
का जो अद्भुत त्रिवेणी संगम देखा .
चलते है फ्लैशबैक में,
अभी कल की ही तो बात है,
कैसे कोई भूल सकता है,
जब इंसान अपनी जिंदगी के
लिए अपनों को छोड़ चुका था,
कौन अपना था,
कौन पराया था ,
इसका इम्तहान का रिज़ल्ट आ चुका था,
वह तड़पते हुए लोग ,
जिन्हें ऑक्सीजन नहीं मिली,
वो अपनों की लाशें जिन्हें ठीक से,
अपनो से अंतिम संस्कार भी मयस्सर नहीं,
वो भी एक मंजर था,
एक मंजर ये भी है,
कहीं विरोधाभास है क्या ?
क्या ये वही लोग हैं ,
बदले बदले से,
जो कोविड की दुहाई दे कर,
अपनों को पहचानते नहीं थे ,
क्या है इंसान की सही फितरत,
क्या है इंसान की सही पहचान ?
कहते हैं , वक्त सब भुला देता है,
नहीं भी भुलाता है ,
तो भूलना पड़ता है,
क्योंकि जिंदगी चलती रहना है,
लम्हे गुजर जाते हैं ,
कुछ मीठी यादें,
कुछ जख्म छोड़ जाते हैं,
कुछ साथी छूट जाते है,
कुछ रह जाते हैं,
और रह जाती है,
एक टीस, वो टीस,
कि शायद हम उनके लिए कुछ बेहतर कर पाते,
और इसी टीस को लेकर जीते हैं,
क्या विडंबना है,
इस एहसास के भी बाद
जो साथ हैं,
उनके लिए टीस न हो ,
इसके लिए क्या कुछ कर रहे हैं ?
क्या है इंसान की असली फितरत ?
क्यों अभी भी नकाब है ?
कहां हैं असली चेहरा ?
सोचा है ?
कोविड से कुंभ तक के,
इस सफर में जो देखा है,
समझा है ?
मुबारक हो,
आखिर
कोविड से कुंभ तक का सफर,
जो तय किया है.
- गुमनाम लखनवी

