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चांद का वजूद


मुक्कमल न होताचांद का वजूद,

गर नहीं होतासैयारा-ज़मीन मौजूद ,

कुर्रा-ए-अर्ज़ तो बेताब हैअपने आफ़ताब के लिए,

घूम रहा है चांद,गलतफहमी लिए.

— © गुमनाम लखनवी
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