ज़ुबान पर ज़ाएका आता था जो सफ़हे पलटने का अब उँगली ‘क्लिक’ करने से बस इक झपकी गुज़रती है बहुत कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता है परदे पर किताबों से जो जाती राब्ता था, कट गया है कभी सीने पे रख के लेट जाते थे