एक देहाती सर पे गुड की भेली बांधे, लम्बे- चौडे एक मैदा से गुज़र रहा था गुड की खुशबु सुनके भिन-भिन करती एक छतरी सर पे मंडलाती थी धूप चढ़ती और सूरज की गर्मी पहुची तो गुड की भेली बहने लगी मासूम देहाती हैरा था माथे से मीठे-मीठे कतरे गिरते थे और वो जीभ से चाट रहा था! मै देहाती......... मेरे सर पर ये टैगोर की कविता की भेली किसने रख दी!