खड़खड़ाता हुआ निकला है उफ़क से सूरज जैसे कीचड़ में फँसा पहिया ढकेला किसी ने चब्बे-टब्बे-से किनारों पर नज़र आते हैं रोज़-सा गोल नहीं उधड़े-उधड़े-से उजाले हैं बदन पर और चेहरे पर खरोंचे के निशान हैं