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मकान की ऊपरी मंज़िल पर - गुलज़ार

मकान की ऊपरी मंज़िल पर अब कोई नहीं रहता वो कमरे बंद हैं कबसे जो 24 सीढियां जो उन तक पहुँचती थी, अब ऊपर नहीं जाती मकान की ऊपरी मंज़िल पर अब कोई नहीं रहता वहाँ कमरों में, इतना याद है मुझको खिलौने एक पुरानी टोकरी में भर के रखे थे बहुत से तो उठाने, फेंकने, रखने में चूरा हो गए वहाँ एक बालकनी भी थी, जहां एक बेंत का झूला लटकता था. मेरा एक दोस्त था, तोता, वो रोज़ आता था उसको एक हरी मिर्ची खिलाता था उसी के सामने एक छत थी, जहाँ पर एक मोर बैठा आसमां पर रात भर मीठे सितारे चुगता रहता था मेरे बच्चों ने वो देखा नहीं, वो नीचे की मंजिल पे रहते हैं जहाँ पर पियानो रखा है, पुराने पारसी स्टाइल का फ्रेज़र से ख़रीदा था, मगर कुछ बेसुरी आवाजें करता है के उसकी रीड्स सारी हिल गयी हैं, सुरों के ऊपर दूसरे सुर चढ़ गए हैं उसी मंज़िल पे एक पुश्तैनी बैठक थी जहाँ पुरखों की तसवीरें लटकती थी मैं सीधा करता रहता था, हवा फिर टेढा कर जाती बहू को मूछों वाले सारे
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