दूर सुनसान-से साहिल के क़रीब एक जवाँ पेड़ के पास उम्र के दर्द लिए वक़्त मटियाला दोशाला ओढ़े बूढ़ा-सा पाम का इक पेड़, खड़ा है कब से सैकड़ों सालों की तन्हाई के बद झुक के कहता है जवाँ पेड़ से... ’यार! तन्हाई है ! कुछ बात करो !’