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अमलतास - गुलज़ार

खिड़की पिछवाड़े को खुलती तो नज़र आता था वो अमलतास का इक पेड़, ज़रा दूर, अकेला-सा खड़ा था शाखें पंखों की तरह खोले हुए एक परिन्दे की तरह बरगलाते थे उसे रोज़ परिन्दे आकर सब सुनाते थे वि परवाज़
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