जब पहली बार खुली थी मेरी आँखें
तेरी चेहरे पे मुस्कान पाया था माँ ।
जब रेंग रहे थे पैर मेरे
तब तुम ही तो चलना सिखाई थी माँ ।
दुर बैठे उस चाँद को दिखा कर
हर एक निवाला खिलाई थी माँ ।
पीठ थपक्ति ,सिर को सहलाती
अपने सीने पे मुझे सुलाई थी माँ ।
मैं जब कभी बाहर जाता या रहता था इम्तहान मेरा
शगुन बता कर दही - शक्कर खिलाई थी माँ ।
जब कभी खुद को अकेला पाया है
तेरी आशीषों का हाथ खुद पे पाया है ।
मेरी खुशी में तुम खुश रहती
मेरे दुःखी होने पे अस्क बहाई है माँ ।
तुम हो तो मैं हुँ तुम न होती तो मैं ना होता
ना देख पाता कि ऐसा भी एक संसार है । माँ ।
ये जग सारा झूठा है बस सच्चा तेरा प्यार है माँ ।