मेरी राह अन्जान थी मैं भी अन्जान थी,
जाने कहाँ से मेरे सिर एक पत्थर आया ।
खून कुछ बहा और कुछ आँसू मेरी आखों में थे,
इस चोट के दर्द से मैने कुछ बुरा कहा पत्थर मारने वाले को ।
चली गयी थी डोक्टर के पास खून न बहे इसे रोकने की आस,
उलझन थी पटटी बन्धे कैसे मजबुरी में कट न जाए बाल ।
बालो की सुन्दरता मुझे प्यारी थी इस सुन्दरता की मैं अकेली नारी थी
चल गयी कैंची बालो पर मै मजबूर पीड़ा की मारी थी ।
अभी कम समय में दवाई पानी शुरु हो गया
माथे पट्टी बंधी थी ओर गन्जी गान शुरु हो गया ।
कभी हँसती मैं कभी चिड़चिडा़ती मैं कभी मेरा भाई कभी मेरी बहन से,
तीन दिन ऐसे ही चला
अगले दिन मुझे कैप और दुपट्टा मिला
सूनी-सूनी बाते पत्थर की करती रही गुन गान गन्जी के,
कानो से सुनती रही, सामने मेरे दर्पण रखा है
अब हाथ कहाँ चलते है किसी कंघी और बालो पर ।
मेरे घर मेरे मामा जी आऐ उनकी दुलारी उनके सामने ना जाये,
ये बात उनको बताई न थी पर उनकी बहन उन्हे बताए ।
छोड़ो ईशवर पर जो हुआ सो हुआ,
पर तेरे बालो का क्या, दुआऐं तेरे लिए हजार है,
पहले से ज्यादा आने वाले तेरे बाल है ।
बड़ो की बात और मेरी आँख सपने देखें साठ साठ ।