मैं कविता मैं अंजान हूँ, मैं नादान हूँ, और किसी की पहचान हूँ, कलम द्वारा आई कुछ शब्दो की डाल हूँ । कभी रैंग-रैंग चले कलम कभी कभी दौड़ी जाए, कुछ शब्दो से बने डाल और कुछ शब्दो से जाल बुन जाए । तीन उंगली का सहारा लेखक सोच द्वारा, कलम रखती हे स्याही शब्दो के द्वारा । पढ़ना-पढ़ाना-पढ़ाई स्याही के अक्षर ढाई, जीवन छीपा हे इन्ही शब्दो में कहते रहे सांई । मैं कविता, मैं मिलती हुँ कुछ पन्नो कुछ किताबो मे, कुछ स्याही के रंगो में, जीवन का हिस्सा हुँ जीवन के रंगो में । बाल-लड़क-होश जवानी का आधार इन्ही शब्दो से बंधा जीवन का तार, विचार-भावना-अंतिम वर्ष कहना चाहुँ शब्द सवा हजार । मैं कविता मैं अंजान सोच मेरी मेरा आधार, किस्सा जो पल चाहे नाराज नही हूँ कुछ शब्दो से बनी मैं मन-तर्क और प्यार । मैं कविता कुछ शब्दो की डाल हूँ, नदियो का पानी-पहाड़ो की हवाऐं हर हिस्से की जान हूँ । समुद्र-पैड़-फूल हरियाली मैदान हूँ, कागज के पन्ने न किसी पर सिम्टी ताल हूँ । कहती हुँ जिन रास्तो को वो सरल होते है, मुझे पढ़ना ही मेरे शब्द होते है । मैं कविता मैं अंजान हूँ, मैं नादान हूँ, और किसी की पहचान हूँ, कलम द्वारा आई कुछ शब्दो की डाल हूँ ।