किताब - आज़ादी मेरा ब्रांड

लेखिका - अनुराधा बेनीवाल

प्रकाशन - सार्थक (राजकमल प्रकाशन )

मूल्य - 199 रुपए


अनुराधा बेनिवाल की यह पुस्तक केवल यात्रा वृतान्त ना होकर खुद में एक यात्रा है। ये यात्रा एक प्रश्न यात्रा खड़ा करती है। इस एकाकी यात्रा में अपनी यात्रा के साथ साथ स्त्री वर्ग के जीवन की यात्रा को भी कहीं ना कहीं दर्शाया गया है जो कि समाज की बेड़ियों में उलझ के अपनी निजी स्पेस खो देती है। यह उनके घुमक्कड़ी के संस्मरणों की श्रृंखला और पहली यायावरी आवारगी की भी पहली किताब है। इसमें उन्होंने 2014 में अपने यूरोप ट्रिप के 10 देशों का ज़िक्र किया है जिन्हें उन्होंने हिच हाईक (लिफ़्ट ले कर एक जगह से दूसरी जगह जाना) करते घूम लिया। ये दुनिया घुमक्कड़ लड़कियों के लिए सेफ नहीं है ना हीं आइडियल हम जानते है लेकिन इसका ये कतई मतलब नहीं है कि लड़कियों को घर से निकलना हीं नहीं चाहिए। अगर एक लड़की कहीं बाहर अकेली खड़ी है तो वो असुरक्षित है। लेकिन अगर वंही बहुत सारी लड़कियाँ खड़ी होंगी तो वो सुरक्षित हैं। इसलिए महिलाओं को अपनी सुरक्षा के लिए ख़ुद हीं आगे आना चाहिए। बहुत हीं आसान शब्दों में यात्रा के तालमेल के साथ उन्होंने महिलाओं के जीवन की यात्रा को दर्शाया है। यह किताब लड़कियों को सम्मान के साथ जीवन जीना और अपनी निजी स्पेस खोजना सिखाती है। मेरा मानना है कि ये किताब सिर्फ हर भारतीय लड़की को हीं नहीं बल्कि पुरूष को भी पढ़नी चाहिए।

अनुराधा बेनिवाल की ये किताब रूढ़िवादी समाज के दायरों में सिमटी आज़ादी को मुक्त करने की बात करती है और हमें अहसास दिलाती है कि आज़ादी लड़कियों का भी ब्रांड है।

उन्होंने अपनी पुस्तक के अंत में हमवतन लड़कियों के नाम एक ख़त लिखा है। यह उन सभी लड़कियों के लिए है जो खुद या फिर समाज की बनाई हुई बेड़ियों में जकड़ी हुई हैं।

सबके बाद, हमवतन लड़कियों के नाम -

पेश है अंश-

मेरी ट्रिप यहीं खत्म होती है। यहां से पेरिस और फिर वहां से वापस लंदन, बस। लेकिन मेरी यात्रा अभी शुरू हुई और तुम्हारी भी। तुम चलना। अपने गांव में नहीं चल पा रही तो अपने शहर में चलना। अपने शहर में नहीं चल पा रही तो अपने देश में चलना। अपना देश भी मुश्किल करता है चलना तो यह दुनिया भी तेरी ही है, अपनी दुनिया में चलना। लेकिन तुम चलना। तुम आजाद बेफ़िक्र, बेपरवाह, बेकाम, बेहया होकर चलना। तुम अपने दुपट्टे जला कर, खुले फ्रॉक पहनकर चलना। तुम चलना ज़रूर!

तुम चलोगी तो तुम्हारी बेटी भी चलेगी, और मेरी बेटी भी। फिर हम सबकी बेटियां चलेंगी। और जब सब साथ चलेंगी तो सब आज़ाद, बेफ़िक्र और बेपरवाह ही चलेंगी। दुनिया को हमारे चलने की आदत हो जाएगी। अगर नहीं होगी तो आदत डलवानी पड़ेगी, लेकिन डर कर घर में मत रह जाना। तुम्हारे अपने घर से कहीं ज़्यादा सुरक्षित यह पराई अनजानी दुनिया है। वह कहीं ज़्यादा तेरी अपनी है। बाहर निकलते ख़ुद पर यकीन करना। ख़ुद पर यक़ीन करना। ख़ुद पर यकीन रखते हुए घूमना। तू ख़ुद अपना सहारा है। तुझे किसी सहारे की जरूरत नहीं। तुम अपने- आप के साथ घूमना। अपने ग़म, अपनी खुशियां, अपनी तन्हाई -सब साथ लिए-लिए इस दुनिया के नायाब ख़जाने ढूंढना। यह दुनिया तेरे लिए बनी है, इसे देखना ज़रूर। इसे जानना, इसे जीना। यह दुनिया अपनी मुट्ठी में लेकर घूमना, इस दुनिया में गुम होने के लिए घूमना, इस दुनिया में खोजने के लिए घूमना। इसमें कुछ पाने के लिए घूमना, कुछ खो देने के लिए घूमना। अपने तक पहुंचने और अपने आप को पाने के लिए घूमना, तुम घूमना !


किताब के कुछ पसंदीदा अंश यूँ तो और भी हैं लेकिन यँहा सभी लिखना सही नहीं होगा बाकी के अंश आप ख़ुद हीं पढ़े तो अच्छा महसूस करेंगे।

1. क्यों नहीं चलने देते तुम मुझे? क्यों मुझे रह-रहकर नजरों से नंगा करते हो? क्यों तुम्हें मैं अकेली चलती नहीं सुहाती? मेरे महान देश के महान नारी-पूजको, जवाब दो. मेरी महान संस्कृति के रखवालो, जवाब दो! मुझे बताओ मेरी कल्चर के ठेकेदारों, क्यों इतना मुश्किल है एक लड़की का अकेले घर से निकलकर चल पाना? जो समाज एक लड़की का अकेले सड़क पर चलना बर्दाश्त नहीं कर सकता, वह समाज सड़ चुका है. वह कल्चर जो एक अकेली लड़की को सुरक्षित महसूस नहीं करा सकती, वह गोबर कल्चर है. उस पर तुम कितने ही सोने-चांदी के वर्क चढ़ाओ, उसकी बास नहीं रोक पाओगे, बल्कि और धंसोगे. मेरी बात सुनो, इस गोबर को जला दो!’मैं चीख रही हूँ, ज़ोर ज़ोर से … जला दो, जला दो ! 2 बजे रात को बर्न की अकेली सड़क पर चीखते चीखते अब मैं रोने लगी थी… मैं यह आज़ादी लिए बिना नहीं जाऊँगी। मैं यह आज़ादी अपने देश ले जाना चाहती हूँ। मुझे इस आज़ादी को अपने खेतों, अपने गाँवों, अपने शहरों में महसूस करना है। मुझे आधी रात को दिल्ली और रोहतक की गलियों में घूमना है – बेफिक्र, बेपरवाह, स्वतंत्र मन और स्वतंत्र विचार से स्वतंत्रता के एहसास से।”

2. लोग कहते हैं कि बचपन के दिन सबसे ख़ास होते हैं, कोई टीन-एज खास बताता है तो कोई ट्वेंटीज़! मुझे तो ये वाली उम्र सबसे खास लगती है, जिसमे मैं हूं। तीस को टच करती, सहज-सी, छुपी-सी, आसान-सी उम्र। हार्मोन्स रह-रह के उबाल नहीं मारते, नए-नए क्रश रात-रात भर नहीं जगाते, ब्रेक-अप्स रात-रात भर नहीं रुलाते। कहने को आप बोरिंग कह सकते हैं, लेकिन मुझे बहुत खास लगती है यह उम्र। किताब पढ़ते हैं तो बस पढ़ते ही जाते हैं, बिना कोई मिस्ड कॉल या बैकग्राउंड में किसी की याद लिए। अपना पैसा थोड़ा कमा लिया है, तो पूरी आज़ादी लगती हैं - घूमने की, पहनने की, बोलने की, फ़िरने की।''