युगान्तर की पीड़ा.

पँक्तियों के खो जाने पर

खामोश धारा में

मेरी साँसों को काटे

दायरे के बाहर

छाया और काया


क्या कुछ है शेष

क्योंकि हर पहचान धुंधली है

पहचान के सारे नाते

और एक सिसकी

धूप और वक़्त की आँच पर

छाया और काया


अजनबी होते

हमारे हिस्से का उजाला

आग में झुलसते डूबते शब्द

छुपाते छुपाते छलक आएंगे ही आंसू

समय के कगार पर

छाया और काया