हां ढूंढ रही हूं आजादी
आज देश भले आजाद है
पर नारी आज भी पुरुषों के बाद है
हां ढूंढ रही हूं
पहुंच गई है कल्पना चांद पर
पर हकीकत में आज भी हूं जमीं पर
मगर भरोसा है मुझे अपने आप पर
ढूंढ रही हूं
देखती हूं स्वप्न खुली आंखों के तले
बूढ़े मां बाप की उम्मीदों को रखने जिंदा
रोशन हो कैसे मेरा ये जहान
जहां घर से निकलना दुश्वार है
सरेराह लूट जाती है इज्जत मेरी
मूकदर्शक बने खड़े है सब
क्योंकि मै उनकी बेटी नही हूं
ना उनकी बहन हूं ना उनके परिवार की हूं
आखिर क्यों करे वो मदद मेरी
मगर फ़िर भी बेशर्म लोगों के ताने तैयार हैं
ये कैसे संस्कार है इसके ऐसे बोलते हैं वो भी
जो ख़ुद दूसरों की इज्जत लुटने में
बराबर के भागीदार है और कहते हैं
आज ना निकलती घर से तो ये ना होता
इस 21वीं सदी की इस नई दुनिया में
हां ढूंढ रही हूं आजादी इस आजाद देश में
हां आजाद है देश पर सोच कैद है
हां आजाद है देश
पर घृणित मानसिकता आज भी कैद हैं
मामूली चोर को भी तुरंत सजा हो जाती है
पर रेप पीड़िता को न्याय के लिए
मरणोपरांत भी लड़ना पड़ता हैं क्यों
क्योंकि देश आजाद है
कहने को वक्त भी कम पड़ जाए
बाकी का काम सुबह का अखबार कर देती हैं.............
- गोविंद झा ©


