इन रातों ने हीं सँभाला हुआ था मुझे
पर ये भी सहा ना गया इस जमाने से!
खुश रहता था मैं इन आवारा सड़कों पर
कोई घेर के घर ले गया मुझे मेरे ठिकाने से !
मैंने कहा था मुझे अकेला छोड़ दो
मुझे नहीं मतलब किसी आशियाने से !
बहुत सुकून से रहता था मैं अंधेरे में
फसाद पैदा हुआ रोशनी के आने से !
ना जाने क्या रिश्ता है उसका मेरे साथ
शायद वही जो शराबी का मैखानें से !
साक़ी ने दिया है मुझे नजर-ए-पैमाना
वो चाहता है मैं खुश रहूँ इसी बहाने से !
