चलो आज सबके मुखातिब हूं मै।
कहो कौन कहता है कातिल हूं मै।।
अदब से जरा पेश आओ मियां।
जमाने में इकलौता गालिब हूं मै।।
उछलकर न इतना दिखावा करो।
तुम्हारी रगों से भी वाक़िफ हूं मै।।
कभी जब अकेला हुआ तो लगा।
खुदा की कलम हूं या कासिद हूं मै।।
कासिद = डाकिया
लवों पर हमारे सदाकत रही।
मुहब्बत का पैग़ाम शाहिद हूं मै।।
शाहिद = सुंदर
कवि गोपाल पाठक "कृष्णा"
बरेली, उ प्र

