रात का खाना......
चलते चलते, सड़क के पास ही, नज़र पड़ी मेरी, एक भिकारी पे,
आंखें उसकी, थीं बड़ी गहरी, जैसे कुआं अंधेरा, और था भी पानी,
दिखा था मुझको, ख्वाहिश उसकी, अगले वक़्त की रोटी की जो थी,
पेट था उसका भरा भूख से, होंठ थे सूखे, कड़ी धूप थी,
नजर आया बदन पे, निशान कोड़े की, नसीब ने उसे, जमके जो लगाई थी,
ऐसा लगा मुझको, लाके सामने उसको, खुदा ने मुझे, पाठ कुछ पढ़ानी थी,
याद किया मैंने, गुज़रे वो वक़्त को, जिसमें मैंने, तौहीन की थी खाने की,
रूह मेरा कांपा, हड्डियां गलीं, खून सूखा, बत्तियां जलीं, पास उसके, बदन को ढखने, रखा था कपड़ा, जिसमें ना थी सिलाई,
नया था कपड़ा, लग रहा था किसीने, तरस खाकर उसको, टुकड़ा एक दिलाई,
देखने लगा मुझको, उम्मीद से वो, जैसे खुदा था मैं, खज़ाना उसे दूंगा,
हिम्मत ना हुआ, उसे देखने का मुझको, शर्म से झुका था, अपने नाशुक्री पे मैं,
किया याद खुदा को, निकाली कुछ राशि, थमाया उसको, और भागा वहां से,
घर में घुसा तो, कलेश मची थी, बहस का मुद्दा, था रात का खाना,
बना था कुछ ऐसा, जो ना भाया बच्चे को, ज़िद पे था वो, ना खाऊंगा उसे,
उठाया मैंने पखवान वो, साथ बुलाया बच्चे को, और तुरंत गया, उस भिकारी के पास,
मैंने बोला बच्चे को, दे दो खाना अंकल को, ना ना पहले कहा उसने, फिर उसने खुद मानी,
लेके खाना भीकारी ने, पुकारा खुदा को रो रोकर, बात मेरी सुन ली, दे दी रात का खाना,
बेटा मेरा घायल था, दिल पे उसे चोट लगी थी, तबसे हमको कभी पड़ा ना, पूछना उसको आज तुझे क्या है खाना।


