घृत समिधा की चद्दर में लपेट कर,
मिट्टी में क्यो मिला दिया मुझको।
लगा के आग हवा किसने बना दिया मुझको,
मैं तो तुम्हारा ही था क्यो मिटा दिया मुझको।
जताते थे जो हर वक्त हक मुझ पर,
दर्द तो ये है उसी ने जला दिया मुझको।
अब भले ही न याद आऊं कभी,
बरस में एक बार याद करोगे मुझको।
~गोपाल भोजक


