विश्व धरोहर दिवस-
अनदेखी की शिकार होती हमारी ऐतिहासिक धरोहर।
आज विश्व धरोहर दिवस है, कम से कम आज के दिन तो हम अनदेखी के कारण ध्वस्त होती हमारी ऐतिहासिक धरोहर की चिंता तो कर ही सकते है।
पूरे देश की न सही, प्रदेश की भी छोड़ो अपने गांव, कस्बे अथवा शहर की धरोहरों के प्रति तो गंभीर हो सकते है।
मेरा अपना शहर जिसके नाम की पहचान ही उसका गढ़ है। आज वो पूरी तरहां से ध्वस्त हो चुका है।
कभी सोढलगढ़ नाम से जाने जाना वाला सूरतगढ कस्बा सरस्वत्ती नदी के किनारे बसा हूआ है।
सूरतगढ़ का नाम महाराजा सूरत सिंह द्वारा बनवाये गये गढ़ के नाम पर रखा गया था। इतिहासकरो के अनुसार सन् 1705 में महाराज सूरत सिंह ने सरस्वती नदी के किनारे एक किले का निर्माण करवाया था। इसी किले के नाम और बीकानेर रियासत के महाराजा सूरत सिंह के नाम पर सोढल गढ़ सूरतगढ़ बन गया।
कभी इस किले में राजस्व तहसील, थाना व नजदीक ही डिस्पेंसरी सहित आवारा पशुओं का फाटक हुआ करता था। जो धीरे धीरे नए भवनों में शिफ्ट होने अथवा बन्द हो जाने से इस किले की देखभाल बन्द हो गई। प्रशासनिक उदासीनता व नागरिकों की जागरूकता के अभाव में स्थानीय प्रशासन ने किले का ज्यादातर हिस्सा नीलाम कर दिया।बाद में कुछ सांस्कृतिक धरोहर प्रेमियों के विरोध के बाद शेष हिस्से को संरक्षित तो घोषित कर दिया, लेकिन देखभाल व रखरखाव नही होने से किले की दीवारें, मुख्य द्वार व अंदर का भवन पूरी तरहां से जर्जर अवस्था मे पहुंच चुका है।
बचपन मे ये किला हम दोस्तों के खेलने की मुख्य जगह हुआ करती थी।
इस किले की दीवारों व दरवाजों पर हड़जोरा की पत्तियाँ, गरुड़, हाथी, राक्षस आदि की आकृतियाँ हुआ करती थी, लेकिन अब वो सब मात्र लिखने की चीजें रह गई है।
पूर्व में इस किले से शिव पार्वती, कृष्ण की गोवर्धन लीला तथा एक पुरुष एंव स्री पकी हुई मिट्टी से बनी मूर्तियां मिली थी जो अब बीकानेर संग्रहालय में रखी गई है।
किले उतर की तरफ घग्घर नदी है तथा पेयजल हेतु जोहड़ (ढाब) था जिसमे घग्घर नदी का पानी आता था। वहीँ ढाब के बीचों बीच गणेश मंदिर बना हुआ है। भूमाफियाओं के अतिक्रमण के कारण कस्बे के प्रमुख पेयजल श्रोत व मेले मगरियो के लिए विख्यात ढाब पर कभी गणगौर मेले पर पानी मे तैरते नारियल को गोली मारने की परंपरा इसी ढाब में निभाई जाती थी।
लेकिन अब अस्तित्व समाप्त होने को है। अब इसमें शहर का गंदा पानी डाला जाता है।
दो तरहां की प्रकृति वसले कस्बे सूरतगढ़ के दक्षिण रेगिस्तान से घिरा तथा दूसरी और उत्तर दिशा में घग्घर नदी से सिंचित अत्यंत उपजाऊ जमीन से सराबोर है। जहां एशिया का सबसे बड़ा कृषि फार्म स्थापित है।
दक्षिण दिशा के रेगिस्तानी इलाके को सिंचित करने के लिए इंदिरा गांधी नहर बनाई गई थी जिससे रेगिस्तान में भी फसलें लहलहाने लगी है।जिससे कसबे के चारों और हरित आभा बिखरती है।
~गोपाल भोजक


