अपनी उलझने सुलझा रहा हूँ,

बस तेरा साथ चाह रहा हूँ।



बहुत गहरा है तेरा मेरा इश्क,

मैं इसमें डूबता जा रहा हूँ।


मची है हलचल दिल के घरौंदे में,

क्यो मैं तेरी और खींचा जा रहा हूँ।



नज़र क्यो है बस्ती की हम पर,

मैं जहां से पूछना चाह रहा हूँ।



~गोपाल भोजक