आज यानि 15 मई को विश्व परिवार दिवस है, क्या आज की पीढ़ी पारिवारिक रिश्तों एवम संयुक्त परिवार के महत्व को समझते है ? संयुक्त परिवार क्यो जरूरी है इसके महत्व को जानते है ?

हम जानते है कि उच्चशिक्षा, नौकरी बहुत जरूरी है, लेकिन यही कारण है जिससे संयुक्त परिवार खत्म हुये है।

आज दौर न्यूक्लियर फैमिली का दौर है! छोटा परिवार भले ही हमे अपना स्पेस और अपनी मर्जी से उठने, बैठने, पहनने, और जीवन जीने की आज़ादी देती हो, लेकिन घर के बड़े बुजुर्गों से मिलने वाले प्यार और रिश्तों की समझ से दूर भी करता है। हम और हमारे बच्चे दादा-दादी, के अनुभवों, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, बुआ के स्नेह और सीख से वंचित हो जाते है।

संयुक्त परिवार में रहकर हम और हमारे बच्चे न सिर्फ संस्कार सीखते है बल्कि बड़ो का आदर, त्याग की भावना के साथ साथ दूसरे का सम्मान करनेजैसी अच्छी आदतें बचपन से ही सीख जाते है। 

छोटे यानि एकल परिवार के कामकाजी माता पिता के पास वक्त की कमी के कारण बच्चे दादा-दादी, ताया-ताई, चाचा-चाची, बुआ, बड़े छोटे कजिन भाई बहनों के सम्मान, प्यार और अनुभव से वंचित रह जाते है। इस कारण उनमें आपसी प्यार, इज्जत, सहनशाक्ति भी कम होती जा रही है।  

संयुक्त परिवार में सास से लेकर जेठानी, देवरानी, ननद सभी घर की जिम्मेदारी उठाती हैं। जिससे घर के काम का बोझ अकेले के कंधो पर नहीं होता। नौकरी करने वाली महिलाएं बिना टेंशन के ऑफिस जा सकती है, क्योंकि उनके पीछे घर और उनके छोटे बच्चों को संभालने के लिए दूसरे लोग होते हैं।


जो लोग ये मानते है कि संयुक्त परिवार में पति पत्नी को एक साथ समय बीताने का अवसर नही मिलता मैं उनकी इस धरणा को गलत मानता हूँ। बल्कि संयुक्त परिवार में दाम्पत्य जीवन मे प्यार और बढ़ता है। काम के बंटवारे के कारण संयुक्त परिवार में पति पत्नी एक-दूसरे से बात करने के लिए वक्त निकाल पाते हैं। बच्चो को परिजनों के भरोसे छोड़कर घूमने फिरने जा सकते है। और तो और आपसी मनमुटाव होने पर घर के बड़े-बुजुर्ग समझाने के लिए भी होते हैं।

क्या ये सही नही है कि नौकरों के भरोसे पलने वाले एकल परिवार के बच्चों के मुकाबले संयुक्त परिवार के बच्चों की परवरिश अच्छी होती है। घर के बड़े बुजुर्ग बच्चो को कहानी और किस्सों के माध्यम से अनेक जीवन शिक्षाये दे देते है। वही बच्चो को सुरक्षित माहौल भी मिलता है।

एक सन्तान वाले परिवारों की भावी पीढियां आने वाले समय मे बुआ, मासी, मामा, चाचा, ताऊ जैसे रिश्तों के मायने हो भूल जाएगें।


~गोपाल भोजक