समाज मे जहर फैलता मीडिय और हम...
वर्तमान दौर में देश के मीडिया ने दरबारी हो अपना पत्रकारिता धर्म छोड़ दिया है। अब वो अपने एक निर्धारित एजेंडे के तहत 24 घण्टे एक ही तरहां की न्यूज़ चला कर समाज मे जहर फैला रहा है।
हमने देखा कि कैसे न्यूज़ एंकर और चैनल्स ने मार्च के तीसरे और चौथे सप्ताह में वैश्विक महामारी कोरोना को लेकर रिपोर्टिंग कर टीवी स्क्रीन को "कोरोना की रफ्तार का जमाती ड्राइवर", "कोरोना की कितनी जमात", " तबलीगी जमात कोरोना बम", "अब कोरोना के नाम पर जिहाद करेगें," "कोरोना से जंग में जमात का रोड़ा," "मरकज़ की जिद्द बनी महामारी," जैसी एक समाज के प्रति नफरत फैलाती लाईनो से भर दी थी।
ऐसी ही रिपोर्टिंग को लगातार देख कर आम दर्शक ने एक धर्म विशेष को देश मे कोरोना महामारी फैलाने का जिम्मेदार मान लिया था।
आम दर्शक को समझना होगा कि समाज मे जहर फैलाते न्यूज़ एंकर और चैनल्स पैसों के लालच में अपने एक निश्चित एजेंडे के तहत इस तरहां की रिपोर्टिंग कर रहे होते है। जिसका खुलासा मीडिया हाउस पे हुये अबतक के स्टिंग ऑपरेशन से हो चुका है।
समाज मे वैमनष्य व आपसी भाईचारे को खत्म करने में जितना जहर देश के न्यूज़ एंकरों ने घोला है उतना ही आईटी सेल ने सोशल मीडिया पर एक धर्म विशेष के प्रति नफरत वाले हैशटैग चला कर आपसी द्वेष बढ़ाया है।
एक धर्म और समुदाय विशेष के आयोजनों को मीडिया का एक विशेष वर्ग अपने नफरत फैलाने के एजेंडे रूप में इस्तेमाल कर रहा है! तभी तो सुप्रीम कोर्ट तक ने मोहर्रम के जुलूस की इजाजत ये कह कर नही दी कि इससे मुस्लिम समुदाय को फिर से कोरोना फैलाने के लिए टारगेट किया जा सकता है!
अब जब मुंबई हाइकोर्ट ने यह कहा है कि मीडिया ने बेवजह जमात को निशाना बनाया था तब क्या तबलीगी जमात को कोरोना फैलाने का जिम्मेदार बताने वाली मीडिया माफी मांगेगी?
अफसोस माफी तो दूर इस नफरती मीडिया ने इस खबर सहित जमातियों की रिहाई की खबर को ही किनारे कर दिया! ये होता आया है कि किसी भी विपदा अथवा महामारी के दौरान अक्सर राजनीतिक सरकारें बलि का बकरा ढूंढती है!
आज जब देश के आर्थिक, सामाजिक हालात ठीक नही है। रोजगार खत्म हो रहे है, शिक्षा, स्वास्थ्य के हालात भी बेहतर नही है, सरकारी उपक्रमो का निजीकरण किया जा रहा है, तब मीडिया ने अपनी जिम्मेदारी छोड़ पत्रकारिता की बुनियादी जरूरत ही खत्म कर दी है।
टीवी और प्रिंट में परोसी जा रहा घृणा और दूसरे को आरोपित करने की खबरों का ही परिणाम है कि पिछले कुछ वर्षों से लोगों का एक धड़ा झूठ को ही सच मानने लगा है ! इसी का परिणाम है कि अब लोग फल, सब्जी, पान, रिक्शा वाले तक से उसका धर्म पूछने लगे है।
अफसोस अब मीडिया सच नही नफरत परोस रही है...


