चाँद की बिंदिया सजा कर,

रजनीगंधा के इत्र में लिपटी,

माँ की तरहां लोरी सुनाती,

दिनभर की थकान मिटाने,

झींगुरों की पायल पहन के,

सजधज कर आई है रात।

~गोपाल भोजक