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सच...


तुम चाहे नाराज़ रहो

मुझको सच लिखना है,

इंकलाब की आग बुझा दे

तूफानों की औकात नही।

तुम चाहे सच भूल गए हो

हम बगावत लिखते है,

डर के चुप जो हो जाये

ऐसा हमारा लहू नही।

©गोपाल भोजक

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