तू चाहे मुझको हरि, सोने का मढ़ा सुमेरु बनाना मत,

तू चाहे मेरी गोद खोद कर मणि-माणिक प्रकटाना मत,

तू मिट जाने तक भी मुझमें से ज्वालाएँ बरसाना मत,

लावण्य-लाड़िली वन-देवी का लीला क्षेत्र बनाना मत,

जगती-तल का मल धोने को

भू हरी-हरी कर देने को

गंगा-जमुनाएँ बहा सकूँ

यह देना, देर लगाना मत।


~माखन लाल चतुर्वेदी।

जयन्ति पर सादर वन्दन...