कल नव संवत्सर यानी विक्रम संवत 2078 की शुरूआत थी। वर्षो से पूरा देश इस दिन का स्वागत नव संवत्सर के रूप में करता आ रहा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से नव संवत्सर को धीरे धीरे हिन्दू नववर्ष में बदलता जा रहा है! कल मेरे पास जो बधाई संदेश आये उनमें से 70 से 80 फीसडी में नवसंवत्सर की बजाय हिन्दू नववर्ष लिखा था! मुझे आश्चर्य के साथ साथ दुख भी हुआ कि कैसे एक कट्टरपंथी सोच और देश की एकता अखंडता को बांटने वाली ताकते हमारे दिलो दिमाग घर कर रही है! और हमारे नव संवत्सर को हिन्दू नववर्ष बन रही है!

इस प्रकार की सोच देश की गंगा-जमुनी संस्कृति को तोड़ कर रख देगी। सोचे भविष्य में अगर इस देश रूपी बगिया के अलग अलग रंगों और सौंदर्य बिखरते पौधे अलग अलग हो कर अपने अपने धर्म सम्प्रदाय और जाति के हिसाब से अपने त्यौहार और अपने अपने नववर्ष मनाने लगें तो ? कल जब देश मे रहने वाले बाकी देशवासी सिक्ख समुदाय के लोग सिक्ख नव् वर्ष या मुस्लिम भाई मुस्लिम नव् वर्ष, ईसाई लोग इसाई-नव् वर्ष या जैन, बौद्ध नववर्ष के रूप में अपना अपना नव् वर्ष इसी शिद्दत से मनाने लगेगें तक क्या होगा ? क्या ये देशहित में होगा ? 

    हमे बचपन मे सिखाया गया था कि अपनी खुशियो में सबको शामिल करो लेकिन इस तरहां से हम एक दूसरे से दूर होते जायेगें जिसका परिणाम देश की एकता और अखंडता के लिए सही नही होगा।

अब कुछ कट्टरपंथी विचारधारा के लोग मुझे ये भी कह सकते है कि मैं हमेशा अपने धर्म का विरोध करता हूँ, क्योंकि उन्हें लगता है कि मेरी ये बातें धर्म विरोधी है! क्या हमें अपने घरों की साफ सफाई नही करनी चाहिये ? बहुत बार ऐसा होता है कि हमारे अपने या रिश्तेदार के पैरों में लग कर घरों में गंदगी प्रवेश कर जाती है, उसे साफ कर हम घर को पुनः स्वच्छ बना लेते है। ठीक वैसे ही हमे हमारे आसपास हमारी सोच और हम जिस परिवेश में देश मे रह रहे है उसकी गंदगी को साफ करना है। हमे बदलाव अपने से शुरू करना होगा, दूसरों से अपेक्षा रखने की जरूरत नही है। ठीक ऐसे ही हमे हमारे समाज और सप्रदाय में घर कर रही बांटने वाली बातों को छोड़ कर एकता का मंत्र गढ़ना होगा। तभी देश खुशहाल होगा...

वरना ये होशियारी हमे कहीं का नही रखेगी।


~गोपाल भोजक