मेघ गर्जन कर रहे, नाचे मन मयूर,
इस मौसम मन में बंधे प्रीत की डोर।
देख रूप की लालिमा मन सतरंगी होय,
इस हालत में साहिबा कैसे रहेगा दूर।
कमर लचकाती गौरड़ी चले हिरणी सी चाल,
फूल सुहाने है खिले सब जग को हर्षाय।
उसके आने से जीवन मे भरे रंग अनेक,
सुना पन सब खत्म हुआ मन मे बजे मृदंग।
~गोपाल भोजक


