उठ न जाऊं मैं फिर से कहीं,
मुझको अर्थी से बांध के ले चले।
कहीं कब्र से बाहर न निकल जाऊं,
मेरे अपने मेरी चिता को जला के चले।
जाग न जाऊं मैं इस नींद से कहीं,
रात भर वो मेरी लाश के सिरहाने बैठे।
रह न जाये कुछ भी वजूद मेरा,
मेरी राख भी गंगा में बहा के आये।
बाद मरने के कौन याद करता है,
चंद दिनों बाद अपने भी भुल जायेगें।
~गोपाल भोजक


