ये सत्य है कि इंसान कितने भी व्रत कर ले, तपस्या कर ले, भले ही डिग्री कर ले अथवा ढेरों किताबे पढ ले लेकिन मूर्खता अर्जित नही कर सकता! 

यह विशिष्टता इंसान में ईश्वर प्रदत्त होती है।

इसे स्वाध्याय से तो नही हासिल किया जा सकता, हाँ स्वकर्मो से इस विशिष्टता को थोड़ा चमकाया जरूर जा सकता है।

इंसान ही ऐसा इकलौता प्राणी है जिसमे ये खासियत हो सकती है!

मूर्ख अपनी मूर्खता का आत्मवलोकन भी हम स्वय करता है!

अक्सर हम मन ही मन या सार्वजनिक रूप से खहते सुनते है कि "हाय मैं कितना बड़ा मूर्ख हूँ जो पड़ोसी अथवा दोस्तों के चक्कर में अपने बच्चों को महंगे स्कूल में भेज दिया"

या फिर "हाय, मैं भी कितना बड़ा मूर्ख हूं कि शादी से पहले अपनी होने वाली पत्नी को महंगे गिफ्ट देता रहा" 

"हाय मैं कितना मूर्ख हूं कि 8 नवंबर को शाम 8 बजे जिसने नोटबंदी की खबर दी, मैंने उसे बेवकूफ समझा था"

ऐसी सैकड़ो मूर्खताएं और उनके सैंकड़ो किस्से हम सुनते मथव सुनाते रहते है।

ये तो हुई मेरी और आपकी बात, दूसरी तरफ सरकार और राजनेताओं को लगता है कि ये कैसे मूर्खों का देश है, जहां के लोगों को लगता है कि हर गड़बड़ में सरकार अथवा नेता ही दोषी दिखाई देता है। 

नोटबन्दी से जीडीपी नीचे आई हो, या लॉक डाउन से बेरोजगारी बढ़ी हो, कन्याकुमारी में ट्रेन दुर्घटना हुई हो तो भी प्रधानमंत्री को दोष! ट्रंप अगर सीरिया को धमकी दे तो मुसलमानों का भारत में क्या होगा ? इसका जवाब भी प्रधानमंत्री से मांगा जाता है। ये सब पूछना न मेरा आपका काम है, न ही अब मीडिया का काम

इस लिए आप सरकार और अपने नायक के कहने पर ताली, थाली, शंख, घड़ियाल, बजाते रहे, अपने नेताओं के कहने पर हिन्दू-मुसलमान, किसान-साहूकार, दलित-स्वर्ण, कोंग्रेस-भाजपा करते हुये जय श्रीराम के नारे लगाते हुये अपनी और अपने बच्चो की बेरोजगारी को भूल कर समझदारी की कम्बल ओढ़े रहे!

क्योंकि सरकार और हमारा नेता मुर्ख थोड़े ही है...

उसने किया अथवा कहा है तो कुछ सोच कर ही किया होगा...

हमे तो बस चुप रह कर सरकार की चुप्पी का आनन्द लेना है, फिर भले ही 2 करोड़ रोजगार की बात हो अथवा किसानों के चार माह से चल रहे आंदोलन पर सरकार की चुप्पी हो। अब कौन ई नासमझ किसानों को समझाये जो बिना मांगे बिना चाहे उनके भले के लिए बने कृषि कानूनों का विरोध कर रहे है। और सरकार मूक बैठी तमाशा देख रही है या फिर चुनाव में व्यस्त है। हमारे प्रधान मंत्री जी नोटबन्दी के दौरान खूब बोले, चुनाव से पहले बेरोजगारी और रोजगार पर भी बोले, गिरती जीडीपी पर भी भधन दिया, किसानों व्यापारियों, मकदूरो के हितों की भी खूब बातें की, लेकिन अब एक दम चुप है ! भले ही प्रधानमंत्री किसी भी मसले पर कुछ भी न बोले, लेकिन मन 'मौन' सिंह हमारे पूर्व प्रधानमंत्री मन मोहन सिंह ही होगें।

जिन्हें देश के 600 करोड़ मतदाताओं ने चुना हो, जिन्होंने बंग्लादेश की आज़ादी के लिए जेल यात्रा की हो ( कौनसे देश मे ये नही पता ) जो घड़ियाल से खेला हो, जंगलों की खाक छानी हो, चाय बेची हो, एंटायर पॉलिटिक्स की डिग्री धारक हो उसके सामने रहूँ गांधी तो पप्पू ही रहेगा ना क्या हुआ जो थोड़ा बहुत पढ़ा लिखा है !

इसलिए आज के इस विशेष दिन पर जिन जिन में ईश्वर प्रदत्त ये विशिष्टता है वो उसका आनन्द लेता रहे...हमे अपनी समझदारी का लबादा नही उतारना है, क्योंकि सरकार और हमारा नेता मूर्ख नही है...

~गोपाल भोजक