उज्जवल सोच
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जब राह में मंज़िल छूट गई
अफ़सानों से टकराना क्या
अभी उम्र है बांकी सालों की
इन चोटों से घबराना क्या ---
मुझे देख मैं तेरे जैसा हूँ
फिर अपनों से कतराना क्या
इन झूठ मूठ की बातों से
नन्हे दिल को बहलाना क्या ---
दुनिया के कोने विस्तृत हैं
इस घेरे में अड़ जाना क्या
इस रंग बिरंगी दुनिया में
बंद आँख किये मर जाना क्या ---
(डा. गोपाल सिंह मेहता)

