फिर आज कहीं कुछ बदला है
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एक तुम्हारा चेहरा है
और एक दिए की जलती लौ
मन का दर्पण कुछ धुँधला है
फिर आज कहीं कुछ बदला है ---
सांसों की सरगम कहती है
यादों की आहट आयी है
मन के अंदर कुछ पिघला है
फिर आज कहीं कुछ बदला है ----
मेरे बाँहों के आलिंगन में
हर शाम तेरी शर्मायी है
रह रह के मन कुछ मचला है
फिर आज कहीं कुछ बदला है ---
तस्वीर तेरी फिर आज मेरे
आँखों में उतर कर आयी है
आँखों से पानी निकला है
फिर आज कहीं कुछ बदला है ---
वो वक़्त जो साथ गुजारा था
जीने का एक सहारा था
दामन से ऐसे फिसला है
फिर आज कहीं कुछ बदला है ---
जब याद तुम्हें कर लेता हूँ
कुछ और समय जी लेता हूँ
ये मन तो यूं ही पगला है
फिर आज कहीं कुछ बदला है।
(डा. गोपाल सिंह मेहता )