मेरे कृष्ण ---
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उर में उसका ही प्यार लिए
नयनों में मृदु श्रृंगार लिए
मैं अपलक उसे निहारता हूँ
उतरा है शून्य क्षितिज से वह
मैं हर पल उसे पुकारता हूँ ---
निष्प्राण देह को सिंचित कर
उसने मेरा सम्मान किया
मेरी कश्ती में साहिल बन
दुःख के सागर के पार किया
उसकी छवि मेरे नैन बसी
जिसने मेरा उद्धार किया
मैं नित नये पाट उघारता हूँ ----
बोझिल आँखों में झाईं पड़े तो भी ना मूंदूँ नयनों को
जो जीभ में छाले पड़ बैठे तो भी अधरों को चलने दूँ
जीवन तुमने जो भेंट किया
उसे अर्पण आज तुम्हें कर दूँ
बन के यम रूप पधारोगे
मैं बाट तुम्हारी निहारता हूँ ----
(डा. गोपाल सिंह मेहता)

