मन के पड़ाव -----



क्यों डूब जाता है मन कभी-कभी

उदासी के भंवर में

ये उम्र के पड़ाव की दास्ताँ है

या फिर विघटित मन की दशा


कभी-कभी कुछ भी अच्छा नहीं लगता

विरक्ति का गमछा डेल गले में

शून्य हो जाता हूँ में


क्यों थक गया है मन

ज़िन्दगी की भीड़ भाड़ में चलते-चलते

यह एहसास है मनः शांति का

या फिर जीवन का फलसफा


कुछ इस तरह से उदास है मन

जैसे सूखे दरख़्त पर बैठा पंछी

ना उड़ने की चाह है

न ठहरने का सुकून


डा गोपाल सिंह मेहता

उदासी के भंवर में

ये उम्र के पड़ाव की दास्ताँ है

या फिर विघटित मन की दशा


कभी-कभी कुछ भी अच्छा नहीं लगता

विरक्ति का गमछा डेल गले में

शून्य हो जाता हूँ में


क्यों थक गया है मन

ज़िन्दगी की भीड़ भाड़ में चलते-चलते

यह एहसास है मनः शांति का

या फिर जीवन का फलसफा


कुछ इस तरह से उदास है मन

जैसे सूखे दरख़्त पर बैठा पंछी

ना उड़ने की चाह है

न ठहरने का सुकून


डा गोपाल सिंह मेहता