"कोविड काल का प्रेम प्रसंग"


आज इतने दिनों बाद

मुझसे मिलने आयी थी

होंठों की मुस्कान छुपी थी

दो गज की दूरी साथ लायी थी।


गले लग जाती थी तपाक से

जी भर देखने से पहले

अजनबी सी बन

आज वो कुछ घबरायी थी।


कशमकश थी कि गले लगूँ या ना

खुद को रोके हुए खामोश

आंखों से मुस्करा

थोड़ा सकपकाई थी।

बांहें फैला दी मैंने ये सोच

कि समा जायेगी आलिंगन में

कागज़ के टुकड़े को दिखधत्त! वो कोविड पॉजिटिव हो आयी थी।


खड़ी रही यूँ ही सामनेआंखों से आंखे अड़ा

मानो आंखों में मेरे भाव

मन ही मन पढ़ पायी थी।

बोली छेड़ते हुएलगोगे गले?

मैं अवाक सा खड़ा रहावो जोर से खिलखिलाई थी।


बस इतनी सी हिम्मत है?

क्या हुआ साथ जीने मरने की कसमों का?

चलो, बक्श दिया तुम्हें

लिहाज़ कर लो रश्मों का।

क्या बात करने से भी ये फैलेगा?

इतने दूर से मिलने आयी थी

'तुम प्रतिरोधक क्षमता हो मेरी'

वरना तो मेरे पास दवाई थी।


छोड़ देगा कोविड जल्दी ही मुझेजब पता चलेगा मैं तुम्हारी हूँ

भर लेना बाहों में तब मुझे

बस यही बताने आयी थी।