इत्तेफ़ाक़ तो नहीं
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सितारों की महफ़िल में आना
गुनाह तो न था
मगर चाँद से आँख लड़ाना
इत्तेफ़ाक़ तो नहीं ----
सुना बहुत है आपके बारे में
कि ग़मज़दा हैं आप
फिर ये मुस्कराना
इत्तेफ़ाक़ तो नहीं ----
रास आती हैं मोहबतें जिन्हें
तुम वो तो नहीं
फिर आँखों में ये मयख़ाना
इत्तेफ़ाक़ तो नहीं ----
ज़रूर कोई चाँद सा ही होगा
दिल में कभी
वरना तुम्हारा लड़खड़ाना
इत्तेफ़ाक़ तो नहीं ----
आशिक़ी तुम्हारी रगों में है
ये दिखता है 'गोपाल'
दिल का ये छलकता पैमाना
इत्तेफ़ाक़ तो नहीं।
(डा गोपाल सिंह मेहता )

