कहीं मंदिर है, कहीं मस्ज़िद है
कहीं अपनी ताक़त की ज़िद है -
यही हाल रहा तो हर तरफ कोहराम होगा
ना तेरा रहीम होगा, ना मेरा राम होगा -
एक तरफ सियासतदारों के नापाक़ इरादे हैं
और दूसरी तरफ़ हमारा लहू बदनाम होगा
ना तेरा रहीम होगा ना मेरा राम होगा -
क़ौम के नुमाइंदे कुछ, रंज़िश का ज़हर घोलते हैं
पर्दे के पीछे से, हमारी नब्ज़ टटोलते हैं -
यूँ ही बटते रहे ताउम्र, तो जीना हराम होगा
ना तेरा रहीम होगा, ना मेरा राम होगा -
तू भी बैठ के रोयेगा, मैं भी बैठ के रोऊँगा
हर तरफ़ ज़नाज़ों का कोहराम होगा
ना तेरा रहीम होगा, ना मेरा राम होगा -
(डा. गोपाल सिंह मेहता )

