मैं
ना मंदिर हूँ, ना मस्ज़िद हूँ
ना गुरुद्वारा हूँ, ना ही गिरिजाघर हूँ
मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो पहरेदारो
मैं अपने विवेक पर हूँ -
अपनी अपनी क़ौम के नुमाइंदे बन
देश को बांटने चले हो
तुम क्या जानो 'दर्द' मेरी माँ का
तुम दूध से नहीं, छाँछ से जले हो -
नापाक़ इरादों के रहनुमाओं
शायद मैं ही तुम्हारा दर हूँ
मैं
ना मंदिर हूँ, ना मस्ज़िद हूँ
ना गुरुद्वारा हूँ, ना ही गिरिजाघर हूँ -
और इंतज़ार है उस दिन का मुझे जब
ना कोई हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, ना ही सरदार होगा
हाथ में इंसानियत की मशाल होगी
और दिलों में प्यार होगा -
मिटा दो नफ़रत की वो लकीरें
कि मैं सारा ही तेरा घर हूँ
मैं
ना मंदिर हूँ, ना मस्ज़िद हूँ
ना गुरुद्वारा हूँ, ना ही गिरिजाघर हूँ -
कभी मिल के चारों बैठो तो सही
मैं चार मुँह बना तुम्हारे बीच आ जाऊंगा
तुम अपनी अपनी इबादत कर लेना
और मैं भी तुम्हारा साथ पा जाऊंगा -
यूँ दीवारों में क़ैद ना करो मुझे
मेरी गुज़ारिश है -
कि खुली हवा का मैं हमसफ़र हूँ
मैं
ना मंदिर हूँ, ना मस्ज़िद हूँ
ना गुरुद्वारा हूँ, ना ही गिरिजाघर हूँ
मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो
मैं अपने 'विवेक' पर हूँ -
(डा. गोपाल सिंह मेहता)

