अज़नबी 

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 तू कौन थी तेरी याद एक दर्द बन गयी 

खामोसी में ये तेरी आवाज़ हमदर्द बन गयी 

तू मेरा पहला प्यार तो न थी अज़नबी 

फिर क्यों ये बात हमनवाज़ बन गयी ----

कोई और भी चाहता है तुझे, ये सुनकर 

तुझे भूलने का प्रयास ख़ुराफ़ात बन गयी

रात के उजाले में साथ साथ बैठने का एहसास 

कैद है मेरी ज़िन्दगी जिसमें वो हवालात बन गयी ---

मैं देखता था जिसे आते हुए ख़यालों में

वही तस्वीर आज साक्षात् बन गयी 

भूल न पाउँगा तुझे मरकर भी ऐ अज़नबी

जो तेरी याद मरते वक़्त यमराज बन गयी ---


(डा. गोपाल सिंह मेहता)