टूट जाउँ, बिखर जाउँ, ये जो चाहत है तेरी
पर, संघर्ष पथ पर अडिग रहने की फिदरत है मेरी
मेरे चंचल मन को थामने की है जो साजिश तुम्हारी
उसे नाकाम करने की मंजिल है मेरी
काली घटा के अंधकार में मुझे अस्थिर करने की जो कोशिश है तेरी
दृढ़ संकल्प के दिव्य प्रकाश से उसे भेदने की तैयारी है मेरी
अब देखना है जोर है कितना
कठिन डगर के सामने बुलंद हौसलों का तेज है कितना
सत्यता के आवरण में छिपे कलंक का गुरुर है कितना